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रोटी, दौलत और ज़िंदगी का फ़लसफ़ा

Sooba Lal

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            चलते चलते थक जाता है
        
                                                    
                            
तब दो रोटी पाता है,
ये है कैसी जिंदगी,
जो खुद से सम्भल न पाता है।

एक तरफ गरीब की जिंदगी,
रोटी के लिए तरसता है।
वहीं अमीरी का कद देखो,
वो लंबी डग भरता है।

किसी के पास वक़्त नहीं है,
खुद को दो रोटी खाने को,
किसी के पास है वक़्त बहुत,
पर रोटी न है खाने को।

कोई छोड़ देता है रोटी,
अपने को पाने के लिए।
कोई अपनों को ही छोड़ देता है,
रोटी को पाने के लिए।

सेहत कइयों की बिगड़ जाती है,
दौलत पाने के लिए,
कोई दौलत खो देता है,
सेहत को पाने के लिए।

कोई धन के पीछे भाग रहा
कोई तरस रहा है रिश्तों को ,
कोई धन के अम्बार मध्य है,
कोई तरस रहा टूटी छत को।

रोटी, दौलत, सेहत, रिश्ते,
सबका अपना मान है,
पर प्रेम और संतोष बिना,
जीवन केवल नाम है।

जीना है तो प्रेम से जी लो,
हर पल को उपहार समझ,
धन-दौलत सब यहीं रहेंगे,
मानवता सर्वोत्तम समझ।
-सूबा लाल ' अंजाना '
एक घंटा पहले
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