रत्नाकर की अमोल निधि का,
वर्णन करना आसान नहीं।
इसकी गहराई के अंतरंग में,
कोई झाँक सके, इतना ज्ञान नहीं।
किससे तुलना करूँ तुम्हारी,
सबसे अलग हैं गुण तेरे।
मैं अवाक हूँ, शब्दहीन हूँ,
शब्दकोश में शब्द नहीं इतने मेरे।
जितना ऊपर, उतना नीचे,
विस्तृत तेरा संसार है।
अनगिनत जीवों का पालक तू,
प्रकृति का अद्भुत उपहार है।
तेरी लहरों के आँचल में,
जीवन के कितने रूप पले।
कहीं मूँगे के महल सुहाने,
कहीं मोती सीपों में ढले।
कहीं रंग-बिरंगी मछलियाँ,
कहीं विशालकाय जीव रहते।
तेरी गहरी जलराशि में,
न जाने कितने रहस्य बहते।
बादल बनकर जल देता है,
धरती की प्यास बुझाता है।
सूरज की गर्मी से तपकर,
वाष्प बन गगन में जाता है।
वर्षा बनकर खेतों में,
हरियाली का रंग भरता है।
नदियों को फिर राह दिखाकर,
तेरी ओर सफ़र करता है।
धरती का ताप संतुलित रखता,
मौसम का रुख बदलता है।
तेरे भीतर का जल-जीवन,
सृष्टि का संतुलन सँभालता है।
नमक, खनिज और ऊर्जा के,
भंडार अनेक छिपाए हैं।
व्यापार, पर्यटन, मत्स्य-पालन के,
कितने मार्ग बनाए हैं।
पर तेरे शांत स्वभाव के भीतर,
प्रचंड शक्ति भी सोती है।
जब तू विकराल रूप धरता,
धरती तक भय से रोती है।
सुनामी बन जब उठता है,
तट का वैभव मिट जाता है।
मानव के ऊँचे महलों को,
पल में धूल चटाता है।
पर दोष तेरा ही क्या मानें,
हमने भी संतुलन खोया है।
प्लास्टिक, कचरा, तेल बहाकर,
बुरा बीज भी तो हमने बोया है।
जलवायु में बदलाव के कारण,
तेरा स्तर भी बढ़ता जाता है।
हिमखंडों के पिघलने से,
तटवर्ती जन भय से मर जाता है।
हे मानव! अपने स्वार्थ में आकर,
प्रकृति से मत खिलवाड़ करो।
सागर की इस अमूल्य धरोहर का,
मिलकर संरक्षण आज करो।
नदियाँ, पर्वत, वन और सागर,
जीवन के आधार हैं।
इनकी रक्षा करने वाले,
' अंजाना 'जीवन का प्यार हैं।
रत्नाकर! तेरी महिमा का,
पूरा वर्णन कौन करे?
तेरी गहराई को समझने में,
ऐसा ज्ञान नित कौन धरे?
— सूबा लाल ‘अंजाना’