विज्ञापन

मेरा चश्मा

Sooba Lal

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            बड़ा गर्व था मेरी आँखें, जीवन भर साथ निभाएँगी,
        
                                                    
                            
कभी न सोचा, उम्र ढले तो मुझको ही भरमाएँगी।
सेहत का रखा ध्यान पूरा, नियमों का भी सम्मान किया,
फिर भी प्रकृति ने एक दिवस, अपना निर्णय मान लिया।

देखा करता था लोगों को,चढ़ा था चश्मा आँखों पर ,
मन ही मन मुस्काता था मैं, जिसकी मुझको थी नहीं खबर।
कुछ तो शौक़ से पहन रहे थे, कुछ की अपनी लाचारी,
किसी को पास न साफ़ दिखे, तों किसी को दूर की बीमारी।

धीरे-धीरे अक्षर धुँधले, चेहरे भी नहीं पहचान आए,
अख़बार खोलकर पास करूं, तब जाकर कुछ भी पढ़ पाएँ।
मोबाइल भी रूठा-रूठा, उसके छोटे अक्षर खूब सताएँ,
बिना चश्मे के अपने ही घर में, लोग पराए नज़र आएँ।

आँख की जाँच कराई तो, नंबर निकला थोड़ा भारी,
बोला—"बाबू! घबराइए मत, यह तो उम्र की है तैयारी।"
पहना जब पहला चश्मा मैंने, दुनिया लगी तब नई नई,
सूई में धागा हँसकर डाला, किताबें पढ़ने की थी बारी।

तब समझ आया, चश्मा कोई कमजोरी की पहचान नहीं,
जीवन के हर पड़ाव का होता एक नया विधान यही।
अब तो चश्मा मित्र हमारा, हर पल साथ निभाता है,
भूले-बिसरे अक्षरों को फिर आँखों तक ले आता है।

दृष्टि धुँधली हो जाए तो चश्मा साथ निभा देता है,
लेकिन मन की दृष्टि धुँधली हो, कोई चश्मा क्या देता है।
इसलिए आँखों से पहले, मन का दर्पण साफ़ रखो,
जीवन के हर पहलू को फिर, प्रेम-दृष्टि से ही देखो।
– सूबा लाल 'अंजाना'
3 महीने पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all