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मजदूर से पूछो

Sooba Lal

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            मत पूछो मजदूर से कि,
        
                                                    
                            
उसके दिल पे क्या गुज़री है,
मूर्ति गढ़कर देता मंदिर,
इतनी भी क्या मजबूरी है?

उस मजदूर के दिल से पूछो,
जो मंदिर-मूर्ति बनाता है,
जीवन में एक बार भी क्या वह,
दर्शन उनका कर पाता है?

मंदिर बना, दिया जिसको,
वह देख रोज़ हर्षाता है,
दर्शन मेरा दुर्लभ इतना,
कि द्वार भी लाँघ न पाता है।

आख़िर कौन बनाता है
पलंग, घड़ा, जूते, घर-मंदिर?
कौन कुएँ, नलकूप, नहर,
तीर्थ,धाम, विद्या-मंदिर?

भाले, बरछे, तलवार और फरसे,
छुरी, चाकू, हथियार सभी,
हम ही बनाते मेहनत करके,
सहते हैं इनके वार सभी।

दिन-रात मजदूरी करके,
अन्न की पैदावार करें,
भूखे रहकर काम करें हम,
अन्न से घर कोई और भरे।

दिउस मजदूर के दिल से पूछो,
जो मंदिर-मूर्ति बनाता है,
जीवन में एक बार भी क्या वह,
दर्शन उनका कर पाता है?

दिन-रात परिश्रम करके जो,
बड़े गाँव और शहर बनाता है,
उस मजदूर के दिल से पूछो,
क्या दो वक्त की रोटी खाता है?
— सूबा लाल “अंजाना”
2 महीने पहले
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