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मैं रजनी हूँ, मुझसे सीखो, धीरज रखना हर हाल

Sooba Lal

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            मैं रजनी हूँ, तेरी जीवन-संगिनी कहलाती हूँ,
        
                                                    
                            
थके हुए इस जीवन को विश्राम देने आती हूँ।
काहे को घबराता है तू, क्यों इतनी बेचैनी है?
मेरी शीतल गोद में छिपी, नवजीवन की तरुणाई है।

दिनभर की थकान समेटे, जब तू शय्या पर आता है,
नींद की मधुरिम छाँव तले, तन-मन निर्मल पाता है।
मैं जीवन की ताज़गी बनकर, नई सुबह ले आती हूँ,
आशाओं के नवदीप जलाकर, तुझमें ऊर्जा भर जाती हूँ।

चाँद-सितारों की महफ़िल में, मौन संदेश सुनाती हूँ,
प्रकृति के आँचल में छिपकर, जग को राह दिखाती हूँ।
दिन में सूरज कर्म सिखाता, रात मुझे विश्राम कहे,
जीवन की इस यात्रा में, दोनों का अपना काम रहे।

तेरे सुख की हँसी देखती, तेरे दुख को जानती हूँ,
तेरे मन की अनकही व्यथा का, मौन गीत बन जाती हूँ।
बीते पल इतिहास बनें और, आने वाला कल सपना,
समयचक्र की साक्षी बनकर, देख रही जीवन अपना।

हर क्षण तेरी आयु घटे या, अनुभव नए जुड़ जाते हैं,
समय के बहते सागर में, पल वापस कब आते हैं?
जन्मदिवस हो, नववर्ष हो या, कोई पल यादगार,
मैं ही लाती सुख-दुःख के क्षण, जीवन के विविध उपहार।

मत समझ मुझे केवल तम का, कोई भयावह का विस्तार,
मेरी गोद में पलते सपने, करती हूँ उनका शृंगार।
रात ढलेगी, भोर खिलेगी, यही प्रकृति का विधान है,
हर अँधियारे के आगे ही, उजियारे का गान है।

मैं रजनी हूँ, मुझसे सीखो, धीरज रखना हर हाल,
सुख-दुःख आते-जाते रहते, समय नही होता चिरकाल।
थके पथिक! कुछ पल ठहर जा, फिर अपनी मंज़िल पाना,
रात विदा लेकर जाएगी,होगा नया सवेरा आना।
-सूबा लाल ‘अंजाना’
एक घंटा पहले
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