काली रात में काली बदरिया,
रिमझिम रिमझिम बरसे।
विरह से व्याकुल बिरहन गुजरिया,
पिया मिलन को तरसे।
पिया मिलन को तरसे...
सावन की फुहार तरसाए,
पवन उड़ा ले जाए,
भीगे आँचल,
भीगे नैना,
मन की न प्यास बुझाए।
बिजुरी चमके, बादल गरजे,
धड़कन और भी धड़के
,दूर बसे मेरे साँवरे साजन,
नैना राह ही तकते।
पिया मिलन को तरसे नैना...
कोयल कूके अमराई में,
मोर पंख फैलाए,
साजन बिन सूना हर मौसम,
कोई न मन बहलाए।
चूड़ी खनके, पायल रोए,
कंगना दर्द सुनाए,
हर आहट पर दौड़े नैना,
शायद पिया ही आए।
पिया मिलन को तरसे नैना...
सखियाँ झूला झूल रही हैं,
गाएँ मधुर मल्हार,
बिरहन बैठी द्वार निहारे,
बीते पहर हजार।
चंदा बादल में छिप-छिप जाए,
तारे भी शरमाएँ,
पिया बिना यह सावन भी,
आँसू बन बरसाए।
पिया मिलन को तरसे नैना.......
हे बदरा ! संदेशा देना,
मेरे पिया के पास,
बिरहन की सूनी अँखियों में
बाकी बस विश्वास।
जल्दी आओ प्राण अधारे,
अब न और सताओ,
सूने जीवन के आँगन में,
प्रेम का दीप जलाओ।
पिया मिलन को तरसे नैना ..........
-सूबा लाल "अंजाना"