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जीर्ण व्यवस्था को बदलना होगा

Sooba Lal

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            एक तो गरीबी का कहर,
        
                                                    
                            
दूजी गली-गली शराब का जहर।
मेहनत की बेकद्री हर गाँव-शहर,
जीने का कोई रास्ता ही नहीं बचता है।

पढ़े-लिखों की हालत देखकर,
मन सोच के सागर में डूब जाता है।
खेत भी नहीं कि बेचकर खा लें,
फिर इंसान आखिर कहाँ जाए?

जमीन है तो ट्रैक्टर खड़े हैं,
बुआई-कटाई को मशीनें हैं।
नई तकनीक ने काम घटाया,
पर काम माँगने वाले लाखों हैं।

बेरोजगारी बेहिसाब है,
महँगाई कमर तोड़ रही है।
शिक्षा की रीढ़ कमजोर हुई,
विकास की चाल लड़खड़ा रही है।

नींव की ईंट में लोना लग चुका,
मसाले में जोड़ नहीं रहा।
घर अब घर जैसा कहाँ रहा,
दीवार-छत है, पर भरोसा नहीं रहा।

जब व्यवस्था जीर्ण-शीर्ण हो जाए,
तो मरम्मत से काम नहीं चलता।
नए युग की तकनीक के अनुसार,
पुराना ढाँचा बदलना पड़ता।

पुर्जे बदलो या मशीन बदलो,
जरूरत हो तो पूरी व्यवस्था बदलो।
जो जर्जर है उसे नया बनाओ,
पर सबसे पहले इंसान बचाओ।

रोटी, रोजगार और शिक्षा दो,
मेहनत को उसका सम्मान दो।
जिसके हाथों में हुनर है लेकिन काम नहीं,
उसके जीवन को भी एक मुकाम दो।
-सूबा लाल "अंजाना "
2 सप्ताह पहले
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