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धीरे-धीरे बरसे काली बदरिया

Sooba Lal

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            धीरे-धीरे बरसे कारी बदरिया,
        
                                                    
                            
मन हरियाली छायो रे।
नन्हीं-नन्हीं जल की बूँदें,
तन-मन को हर्षायो रे।

प्रियवर! जैसे-जैसे भीगे,
भीजत जाए बदनिया,
प्रेम सुधा मन में बरसे,
परम आनंद छायो रे।
धीरे-धीरे बरसे कारी बदरिया,
मन हरियाली छायो रे।

धान रोपाई की धूम मची है,
घर से निकलीं सब आयें,
हँसती-गाती सखियाँ मिलकर,
धान की पौध लगाएँ।
प्रियवर! कजरी गाएँ मिलकर,
करें धान की रोपाई,
माटी की खुशबू मन महकाए,
सुखद साँझ है छाई रे।
धीरे-धीरे बरसे कारी बदरिया,
मन हरियाली छायो रे।

बिरहिन नारी बिरह से व्याकुल,
प्रिय की याद सताए,
भीगी चुनरिया, भीगी अँखियाँ,
मन की पीर बढ़ाए।
प्रियवर! दिल की बात सखियन से,
कह-कह नीर बहाए,
कब आओगे मेरे सजना,
मन हर पल तुम्हें बुलाए।

बादर गरजे, बिजुरी चमके,
मन में हूक उठाए रे,
सावन की हर बूँद प्रियवर,
तेरी याद दिलाए रे।
आओ प्रिय! अब दूर न रहना,
बिरहन मन समझाओ रे।
धीरे-धीरे बरसे कारी बदरिया,
मन हरियाली छायो रे।

— सूबा लाल ‘अंजाना’
2 महीने पहले
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