ऊपर नील गगन है पसरा, जिसका कोई अंत नहीं,
नीचे सागर भी अथाह है, जिसका कोई छोर नहीं।
ये मन कहीं भी ठहर न पाता,भावों का है यह सिंधु कहीं,
इसकी गति अति तीव्र जगत में, जितनी रवि की रश्मि नहीं।
किंचित मन जब विचलित होता, कहीं मिलता उसे ठौर नहीं,
घूम-घूम कर दिशा-दिशा में,मिलता कोई शांति का छोर नहीं।
लोक-लाज की डोर बाँधकर, चंचल मन बेचैन रहे,
सोच-समझ के जाल बुनाता, सही राह फिर भी न गहे।
प्रेम, करुणा, सत्य की राहें, जिस दिन मन स्वीकार करे,
मोह, भ्रम और तृष्णा को त्यागे, अंतर्मन उजियार करे।
तब यह चंचल पंछी बनकर, अपने निज घर लौट चले,
जहाँ शांति का अमृत बहता, वहीं हृदय के दीप जले।
-सूबा लाल "अंजाना "