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भीड़ ही भीड़

Sooba Lal

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            सफ़र का दौर जहाँ भी देखो, वहीं भीड़ मिल जाती है,
        
                                                    
                            
चारों ओर है धक्कम-धक्का, समझ बात न आती है।

क्या जनता सब ट्रेन में जाती, क्या बस में भर जाती है,
कारों-बाइक और हवाई जहाज़ों में भी नज़र आती है।

मॉल-बाज़ारों में देखो तो भीड़ उमड़ती है भारी,
स्कूल-कॉलेजों में देखो तो , भीड़ लगी दिखती सारी।

अस्पताल को देख लगे, बीमार हुई जनता सारी,
जनता बँट गई जगह-जगह, फिर बचा कहाँ इंसान कोई?

कहीं सफ़र, बाज़ार कहीं, कहीं शिक्षा की है तैयारी,
कहीं इलाज की लगी कतारें, हर ओर लगी मारा मारी।

अंजाना सोच रहा मन में, यह कैसा दौर आया है,
भीड़ तो बढ़ती जाती है, पर आदमी कहाँ समाया है?
-सूबा लाल "अंजाना"
2 घंटे पहले
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