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बंधन बंधन ही रहता है,

Sooba Lal

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            अंग्रेज़ों की गुलामी में भी, एक सपना सँजोया था,
        
                                                    
                            
आजादी का दीप जलाकर, आंसू पोंछा जो रोया था।
वीरों ने अपने प्राण दिए, भारत माँ के सम्मान में,
हर इंसान स्वतंत्र रहे—यही था उनके ध्यान में।

पर आज ज़रा उस नारी से पूछो, जो घर से बाहर जाती है,
कदम-कदम पर भय की छाया, फिर भी मुस्कुराती है।
जिस देश को आज़ाद कराने को वीरों ने बलिदान दिया,
उसी देश में बेटी ने क्यों डरकर जीवन को जिया?

तब बेड़ियाँ पैरों में थीं, शासक था कोई पराया,
आज कई बार अपनों ने ही बंधन का जाल बिछाया।
तब विदेशी सत्ता से लड़ना वीरों का धर्म बना,
आज अपनों के अन्याय से लड़ना नारी का कर्म बना।

क्या आज़ादी केवल इतनी है—घर से बाहर निकलना,
पर हर राह पर डर के साए में कदम-कदम संभलना?
क्या अधिकार वही हैं, जो कागज़ पर लिखे जाते हैं,
या अधिकार वही हैं, जो जीवन में सच बनकर आते हैं?

जिस बेटी को कहते हैं घर की लक्ष्मी, घर की शान,
क्यों उसी के सपनों पर लग जाता है पहरा तमाम?
क्यों उसके वस्त्र, उसकी बोली और चाल पर सवाल हैं,
और उसके सम्मान से बढ़कर समाज के अपने ख्याल हैं?

दहेज की आग में जलती, कहीं बेटी मजबूर है,
कहीं हिंसा सहकर भी उसका मौन ही दस्तूर है।
कहीं शिक्षा से रोका जाता, कहीं सपनों को दबाया,
कहीं जन्म लेने से पहले ही उसका जीवन मिटाया।

अंग्रेज़ों से आज़ादी पाकर हमने तिरंगा तो फहराया,
पर क्या हर बेटी को निर्भय होकर जीना सिखाया?
यदि आधी आबादी भय में अपना जीवन बिताए,
तो फिर आज़ादी का उत्सव किस चेहरे पर मुस्काए?

नारी को दया नहीं, अधिकार और सम्मान चाहिए,
अपने जीवन पर अपना निर्णय लेने का अधिकार चाहिए।
जिस दिन बेटी रात में भी निर्भय होकर चल पाएगी,
उस दिन भारत की आज़ादी सच में सफल कहलाएगी।

गुलामी चाहे पराई हो या अपनों की सोच में हो,
बंधन बंधन ही रहता है, चाहे वह किसी रूप में हो।
वीरों के बलिदान का तब सच्चा सम्मान होगा,
जब हर नारी सुरक्षित, स्वतंत्र और स्वाभिमान होगी।

तब पूछना आज़ादी से—क्या तू सच में आई है?
जब हर बेटी कह सके—“मैं निर्भय हूँ, मैं आज़ाद हूँ।”
जिस भारत का सपना वीरों ने आँखों में संजोया था,
वह भारत वही होगा, जहाँ नारी ने सम्मान से जीना सीखा होगा।
-सूबा लाल "अंजाना"
2 महीने पहले
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