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अनुभवों की निधियाँ

Sooba Lal

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            बड़ी दुविधा में हूँ, किस डगर पर चलूँ,
        
                                                    
                            
एक राह सरल है, जो बिना अड़चन चली जाती है।
क्या उस पर चलूँ, जहाँ कुछ करना ही न पड़े,
या उस पथ पर, जो काँटों से होकर निकल जाती है।

सीधी राह से मंज़िल तो जल्दी मिल जाएगी,
पर जीवन अपनी गहराई कहाँ दिखा पाएगी?
संघर्षों की ठोकरें जब कम पड़ जाती हैं,
अनुभवों की निधियाँ भी अधूरी रह जाती हैं।

ज़िंदगी की रेल में यदि ठहराव कम हो जाए,
तो यादों का हर स्टेशन अनजाना रह जाए।
सुख-दुःख की किताब के पन्ने पूरे खुल नहीं पाते,
आँसू भी अपने अर्थ कभी खुलकर कह नहीं पाते।

जीवन की कहानी के पृष्ठ बहुत कम रह जाते हैं,
बहुत कुछ पा लेने पर भी कई स्वप्न अधूरे रह जाते हैं।
इसलिए समय की रफ़्तार से आगे बढ़कर कुछ कर जाओ,
क्षण-क्षण को अमर बनाकर अपना इतिहास रच जाओ।

जो कल पर टाल रखा है "अंजाना", उसे आज ही पूरा कर जाओ,
लंबे सफ़र की प्रतीक्षा मत करो, अभी कुछ कर दिखलाओ।
जीवन की पहचान वही, जो कठिन राह चुन जाता है,
अपने कर्मों से इस धरती पर, अमिट निशान छोड़ जाता है।
-सूबा लाल "अंजाना"
2 महीने पहले
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