ज़रा ध्यान दो यह कैसी अद्भुत सी सृष्टि रचाई है,
हर प्राणी की झोली में कुछ न कुछ तो कमी भरवाई है।
तालाब का जल ठहरा तो जल्दी कीड़े पड़ने लगते है,
नदियों का निर्मल जल बहकर जीवन-रस को भरते है।
बहने में ही उसकी महिमा, रुकने में अवसाद मिला,
गति के बदले स्थिरता खोई—यही प्रकृति का न्याय मिला।
कुएँ का पानी मीठा होता, पर सब तक पहुँच नही पाता,
सागर विश्व विशाल है फिर भी प्यास किसी की न बुझा पाता।
ऊँचाई, गहराई, विस्तार ही सबका, अपना अपना मान रहा,
पर हर वैभव के आँगन में , कोई न कोई अभाव रहा।
चाँद शीतल अमृत बरसाए, फिर भी रोज़ न पूर्ण रहे,
अमावस्या की काली चादर में ,अपने ही प्रकाश से दूर रहे।
चंदन जग को शीतल करता है, सुगंधों का उपहार लिए,
फल का सुख वह पा न सका है, त्याग का अनुपम हार लिए।
कमल खिला मुस्कान समेटे , कीचड़ की गोद सँभाले है,
सौंदर्य वहीं खिलता है जहाँ अक्सर कठिनाई पाले है।
विद्वान के पास है ज्ञान ,मगर धन अक्सर कम रह जाता है,
धनवानों के महलों में भी , ज्ञानोदय न हो पाता है।
सूरज करता जग उजियारा, पर स्वयं तपन को ढोता है,
बादल अमृत बरसाता हैं, पर पल में खाली होता है।
धरती सबका भार उठाती, बदले में क्या लेती है?
देने वालों की झोली में भी, थोड़ी रिक्ति होती है।
प्रकृति ये कहती—पूर्ण न होना, जीवन का ही श्रृंगार है,
अभावों की इस बगिया से ही खिलता सच्चा प्यार है।
यदि सब कुछ मिल जाए तो, मानव न किसी का सम्मान करे?
कौन किसी का हाथ थामेगा,कौन किसी का ध्यान धरे?
इसीलिए हर हृदय कहीं न, कहीं अधूरा रहता है,
इसी अधूरेपन से आपस में, अपनापन रहता है।
अभाव नहीं तो अभिशाप है मित्रों, यह जीवन का सार है,
एक-दूजे की आवश्यकता ही, मानवता का आधार है।
आओ मिलकर करें प्रतिज्ञा—अभिमान कभी न पालेंगे,
जिसके हिस्से जो कमी रहे, हम सब मिलकर ही टालेंगे।
यही सृष्टि का सत्य सनातन, यही प्रकृति का है संदेश—
अभावों से ही है जुड़ता मानव, प्रेम बनाता अपना देश।
-सूबा लाल "अंजाना"