कैसा ये माहौल बना है, कैसी चलती कहानी है,
देश आज़ाद हुआ मगर क्यों आँखों में हैरानी है?
आग लगी है कोने-कोने, झुलस रहे इंसान सभी,
क्या सचमुच आज़ाद हैं हम, जब दुख से घिरे हैं सभी?
मनमाने कानून बनें जब, अपने हित की खातिर में,
न्याय और समता खो जाएँ, स्वार्थ छिपे व्यवहार में।
पक्षपात के खुले प्रदर्शन, जब-जब नज़र में आते हैं,
मन में उठते प्रश्न अनेक, उत्तर मिल नहीं पाते हैं।
खुले आम अन्याय हो रहा, दोषी छूट निकल जाता है,
पीड़ित न्याय की आस लिए दर-दर ठोकर खाता है।
कानूनों का मान तभी है, जब सब पर लागू होता है,
ऊँच-नीच का भेद मिटे तो न्याय सफल होता है।
अपनी बात कहें तो हम पर, पहरे क्यों लग जाते हैं?
सच के स्वर उठने से पहले, होंठ क्यों सिल जाते हैं?
जनता की आवाज़ अगर संसद तक न पहुँच पाए,
लोकतंत्र का अर्थ बताओ, फिर कैसे समझ में आए?
जनता को अधिकार मिला है, अपना नेता चुनने का,
अपने मन की बात कहने का, अन्याय से लड़ने का।
उस अधिकार की राह में यदि बाधाएँ खड़ी की जाएँ,
जनता के विश्वासों पर फिर कैसे फूल खिलाएँ?
काले कर्मों पर पर्दा हो, सफेद चादर तानी हो,
सच बोलने वाले के हिस्से केवल परेशानी हो।
दोषी को संरक्षण देकर पीड़ित को दंडित करना,
क्या यही न्याय है, या फिर न्याय से मुँह मोड़ना?
छोटी-सी गलती पर जनता दंड तुरंत पा जाती है,
लेकिन बड़े सवालों पर चुप्पी क्यों छा जाती है?
कानूनों का मान सभी को एक समान रखना होगा,
न्याय के मंदिर में सबको निष्पक्ष होकर चलना होगा।
जनता से सरकार बनी है, जनता की आवाज़ सुनो,
उसके सपनों, उसकी पीड़ा, उसके हर अंदाज़ सुनो।
सत्ता सेवा का माध्यम है, इसे कभी मत भूलो,
जनता के विश्वासों को अपने स्वार्थ में मत तौलो।
आजादी केवल झंडा और उत्सव मनाना नहीं है,
अधिकारों की बात कहें तो डरकर चुप हो जाना नहीं है।
सत्य, न्याय और समता का जब तक सम्मान नहीं होगा,
आजादी का हर सपना तब तक पूरा नहीं होगा।
उठो, जगाओ चेतना, अधिकारों का मान करो,
संविधान के मूल्यों का मिलकर सब सम्मान करो।
न्याय, समता, बंधुत्व से भारत का निर्माण हो,
जनता सर्वोपरि रहे, लोकतंत्र का उत्थान हो।
-सूबा लाल ‘अंजाना’