आखिर कब कहूं,
कि यहां पर तुम गलत हो,
कहीं से आने पर कहूं तो बुरा है
खाने के समय कहूं तो बुरा है,
सोने के समय कहूं तो बुरा है,
कहीं जाने के समय कहूं तो बुरा है
तब तक कोई दूसरी गलती हो जाती है
पहले पे पर्दा हो गया क्यों कि देर हो गई,
दूसरी गलती फिर हो गई तो
पहली नहीं कह सकते,कहूं तो बुरा
गलती पे गलती होती रहे
आखिर उसे न दोहराने के लिए कब कहूं,
इसलिए की कही नाराज़ न हो जाए
इसलिए की कहीं बात न बिगड़ जाय
न कहना ही दिल को दुखी करना है,
इससे गलतियां श्रृंखलमय हो जाती है
और एक विस्फोटक स्थिति बन जाती है
इसलिए जो भी हो कह डालो
ये मत सोचो कि कब कहूं।
-सूबा लाल "अंजाना"