विज्ञापन

ओ! आशाओं के बादल।

SONI KUMARI

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            ओ! आशाओं के बादल, तुम टूट पड़ो न मुझ पर,
        
                                                    
                            
नख-शिख भीगा दो मुझको, तुम फूट पड़ो न मुझ पर।

कल्पना के ओत- प्रोत में, गात-गात में, रोम-रोम में
आँच की तह पर तपन में,भभक रही ज्वाला-सी तन में
एक कसक उठी जो मन में, पूर्ण करने को चमन में
खैरियत कुछ आस मिल सके,शून्य वीरान गगन में।

ज्यों जल स्रोत नीरद नभ में, त्यों धीर उर में भर दो
आषाढ़ में बरसे ज्यों छिट पुट, फुहार चित्त में भर दो
धीर तुम,अधीर तुम,वह संतुलन मेरे जीवन में भर दो
नाना रूप,अनगिनत आकार,अनुकूलन लोक में भर दो।

जगत पथ पर सर्वत्र,मंज़िल की आसक्ति सकल थी
पा सके नाथ परमेश्वर को,जग में मैं ना ऐसी एकल थी
छल प्रपंच की राह पर, रफ़ीक की तमन्ना सबको थी
दुविधा भरे सफ़र पर,अनायास बस मैं चली अकेली थी।

ओ! आशाओं के बादल, तुम टूट पड़ो न मुझ पर,
नख- शिख भीगा दो मुझको,तुम फूट पड़ो न मुझ पर।
एक महीने पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all

Manju Sharma

3562 कविताएं

View Profile