घूमता हूँ दर-ब-दर, ख़ुद को ढूँढ़ने,
सूरज उगता है, डूबता है- नियमित;
एक रास्ता- घर के सामने से ही मुड़ जाता है।
गुल्लक की तरह मुझे जो सँभालकर रखते हैं
वो मेरे अपने हैं;
और जो छोड़ जाते हैं, वो भी हैं किसी के अपने।
हर बात को एक तरफ़ रख
मैं निकल जाता हूँ;
राह का अंत तो नहीं-
बस एक दिशा से दूसरी दिशा की ओर
दौड़ती चली जाती है ज़िंदगी।
पीछे-पीछे भागता रहता हूँ मैं,
तलाशता रहता हूँ
उस सँभाली हुई गुल्लक की खनक,
जिसमें शायद अब भी बची हुई है
मेरी थोड़ी-सी अपनी हलचल।