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गुल्लक की तरह मुझे जो सँभालकर रखते हैं

                
                                                         
                            घूमता हूँ दर-ब-दर, ख़ुद को ढूँढ़ने,
                                                                 
                            
सूरज उगता है, डूबता है- नियमित;
एक रास्ता- घर के सामने से ही मुड़ जाता है।

गुल्लक की तरह मुझे जो सँभालकर रखते हैं
वो मेरे अपने हैं;
और जो छोड़ जाते हैं, वो भी हैं किसी के अपने।

हर बात को एक तरफ़ रख
मैं निकल जाता हूँ;
राह का अंत तो नहीं-
बस एक दिशा से दूसरी दिशा की ओर
दौड़ती चली जाती है ज़िंदगी।

पीछे-पीछे भागता रहता हूँ मैं,
तलाशता रहता हूँ
उस सँभाली हुई गुल्लक की खनक,
जिसमें शायद अब भी बची हुई है
मेरी थोड़ी-सी अपनी हलचल।
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36 मिनट पहले

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