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मन का दीपक

Smriti Gupta

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            तारों की शीतल छाँव तले,
        
                                                    
                            
नन्हे-से इन नयनों से,
अपने मन के सूने दीपक को मैं रोशन करती हूँ,
मैं माँ हूँ, उसकी एक हँसी पर सर्वस्व न्योछावर करती हूँ।
जब भरती हूँ बाँहों में उस नन्ही-सी जाँ को,
और वो हँसकर मुझको निहारे,
तब पल भर को ये यकीन नहीं होता,
कि मेरी ही आगोश में सिमटे हैं उसके दुनिया के सारे किनारे।
उसे देखूँ तो लगता है जैसे,
'कान्हा' का कोई वरदान मिला,
मेरा 'छुटकन' नहीं, जैसे सूने आँगन में,
साक्षात प्रेम का कोई फूल खिला।
7 महीने पहले
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