‘कुछ नहीं।‘
कहा उसने;
तो क्या सचमुच
कुछ भी नहीं?
या,
बहुत कुछ;
बहुत, बहुत कुछ?
वह जो
कहा न जा सके।
वह जो
अकथित ही
समझा जाना अपेक्षित हो।
वह जो
समेटे अपने अन्दर
अकथनीय पीड़ा, प्रेम, शिकायत;
वह जो
इतना अगाध,
वह जो
इतना विस्तीर्ण,
कि सिमिट न सके
शब्दों में।
(स्कन्द शुक्ल)