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‘कुछ नहीं’

                
                                                         
                            ‘कुछ नहीं।‘
                                                                 
                            
कहा उसने;
तो क्या सचमुच
कुछ भी नहीं?
या,
बहुत कुछ;
बहुत, बहुत कुछ?

वह जो
कहा न जा सके।
वह जो
अकथित ही
समझा जाना अपेक्षित हो।
वह जो
समेटे अपने अन्दर
अकथनीय पीड़ा, प्रेम, शिकायत;
वह जो
इतना अगाध,
वह जो
इतना विस्तीर्ण,
कि सिमिट न सके
शब्दों में।

(स्कन्द शुक्ल)
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3 वर्ष पहले

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