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कविता

Skand Shukla

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            वह भी क्या घर लगता है -
        
                                                    
                            
जहां बहस नहीं मनुहार नहीं,
जिसमें प्रेम की खुशबू सोंधी सी,
कोई जीत नहीं कोई हार नहीं

घर, तब घर सा लगता है -
अखबार बिस्तर पर पड़ा हुआ;
कुछ कुर्सियां बेतरतीब सी,
किसी पर गीला तौलिया।

ड्राइंग रूम की दीवारें,
क्रेयॉन से रंगी हुईं;
एक किताब अध-पढ़ी सी,
सोफे पर पड़ी हुई।

वह भी क्या घर लगता है -
करीने से सब सजा हुआ
दीवारें सुंदर, पर सूनी सी,
जिन्हें आड़ी तिरछी रेखाओं ने नहीं रंगा।
- स्कंद
3 वर्ष पहले
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