विज्ञापन

क्रांति की हुंकार

Shweta Singh

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            सन बयालीस के अगस्त की, वो गरम हवा जब डोली थी,
        
                                                    
                            
हिंदुस्तान के जर्रे-जर्रे में, इंकलाब की बोली थी।
क्रूर फिरंगी के जुल्मों से, धरती व्याकुल अकुलाई थी,
गुलामी की उन जंजीरों में, एक नई चेतना आई थी।
बम्बई के गवालिया टैंक से, एक बूढ़े ने हुंकार भरी,
अहिंसा के उस पुजारी ने, रण की अद्भुत तान हरी।
"करो या मरो" का मंत्र दिया, जन-जन के मन में आग लगी,
सदियों से सोई भारत की, किस्मत उस दिन आन जगी।
विदेशी राज के तख्त और, ताज को अब हिलना ही था,
भारत की इस पावन माटी को, अब आजादी मिलना ही था।
"अंग्रेज़ों भारत छोड़ो" का, नारा नभ में गूंज उठा,
हर बालक, बूढ़ा और युवा, आज आज़ादी को ढूंढ उठा।

 
3 महीने पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all