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मैं तुम्हें कभी ख़ुदा नहीं मानूँगी

Shubhangi K.

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            मैं तुम्हें कभी ख़ुदा नहीं मानूँगी।
        
                                                    
                            

क्यों?

कभी लगता है, वो बस मंदिरों में होता है।
गुहार किसी की अनसुनी करता है,
रोता होगा कोई शख़्स उसके आगे किसी अपने के लिए,
न जाने क्यों वो अनसुना करता है।

कभी लगता है मुझे पत्थर वो,
कभी किसी को बिन माँगे दे देता है।
कभी खुशियों से भर देता हैं किसी को,
तो किसी की झोली खाली कर देता है।

इसलिए तू मेरा ख़ुदा नहीं है,
तू मेरा एक हिस्सा है,
जिससे जुड़कर सब कुछ पूरा लगता है।

तू सुनता है जो मैंने कभी कहा नहीं,
तू अनकहे जज़्बात मेरे पढ़ लेता है।
रोक लेता है बहने से पहले अश्क मेरे,
तू मुझे उस ख़ुदा से भी प्यारा लगता है।



 
एक महीने पहले
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