अंग्रेज़ चले गए,
हम आज़ाद हो गए।
इतने आज़ाद
कि लगा,
हर चीज़ की
आज़ादी मिल गई।
अपने ही देश को
लूटने की आज़ादी,
आबरू लूटने की आज़ादी,
हत्या करने की आज़ादी,
ऐन- केन- प्रकारेण
सत्ता लूटने की आज़ादी।
निरंकुशता इतनी कि जैसे
हम बुरी तरह आज़ाद हो गए,
इतने आज़ाद हुए
कि अपनी ही मानसिकता के
ग़ुलाम हो गए।
तो भाई,
समस्या जड़ में है
और हम
पानी डाल रहे हैं फुनगी में,
तो कैसे......
कैसे सब अचानक ठीक हो जाएगा?
भ्रष्टाचारियों की तादाद है ज्यादा
और इस बात को
समझने वाले हैं चुनिंदा।
जिनके दम पर
दुनिया चल रही है,
अगर ये चुनिंदा लोग भी
ख़ुद ही अपनी संख्या
बढ़ाने की बजाए
कम करने लगेंगे,
तो कैसे चलेगी दुनिया?
ये भी तो सोचिए वांगचुक जी!
आपको नहीं पता
मगर वही चुनिंदा हैं आप,
आपको अपनी तरह बनाना है
कई वांगचुक और
बढ़ानी है तादाद अपनी,
ताकि भ्रष्टाचार ख़त्म किया जा सके।
क्योंकि
ये पेपर तो लीक होते हैं तब,
इसे खरीदने वाले भी होते हैं जब।
इन दोनों की मिलीभगत
ख़त्म करने के लिए
आपको ज़िंदा रहना होगा,
ख़ुद को ख़त्म नहीं करना होगा।
क्योंकि
आपके ख़त्म होने से
होगा क्या?
चार दिन में आप
भुला दिए जाएंगे,
सब पूर्ववत
अपने काम पर लौट जाएंगे।