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ओ, पुलिस वाले भैया!

Shreyasi Satish

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            ये कैसा मंज़र दिखा रहे हो
        
                                                    
                            
पुलिस वाले भैया,
अठारह सौ सत्तावन की
याद दिला रहे हो भैया।
अपने ही देश के बच्चे हैं वो,
किताबों वाले हाथों में क्यों?
पत्थर थमा रहे हो भैया।
गुलाब बाँट रहे हैं वो,
तुम क्यों शूल चुभो रहे हो भैया।
माना तुम आदेशों का
पालन कर रहे हो,
मगर डंडे पर कितना ज़ोर लगाना है,
ये तो तुम पर निर्भर है न भैया।
सर फोड़ कर भी
तसल्ली न हुई, जो
जूते से उसकी छाती
मसल रहे हो भैया।
अंग्रेज़ों की नकल कर रहे हो,
या गब्बर सिंह की भैया?
या बनना चाहते हो जनरल डायर,
तो बरसा दो गोलियाँ मासूम काफ़िलों पर।
पंद्रह अगस्त, छब्बीस जनवरी को,
झंडे के नीचे जलेबी खाकर,
क्या मुंह मीठा नहीं हुआ?
जो आज जनता पर इतना
ज़हर उगल रहे हो भैया।
इस कारनामे पर, अपने आप को
शेर बताकर,
चैन की सांस लेते हुए,
अभी तो सो रहे हो भैया।
मगर जीवन की अंतिम घड़ी में,
जब मृत्यु निकट आएगी,
ज़मीर जागते हैं सभी के,
निश्चित ही जागेंगे तुम्हारे भी।
तब ख़त्म हो जाएगी चैन की नींद,
करवटें बदलते ही कटेगी हर रात।
पलटोगे जब अपने जीवन का पन्ना,
देखोगे जब अपना ही क्रूर इतिहास,
तब भीतर से निकलेगी एक ही आह-- "काश!"
पर उस वक़्त कुछ नहीं कर पाओगे,
पश्चाताप के साये में
घुट-घुट कर रह जाओगे।
बेहतर है अब भी संभल जाओ,
वर्दी के कर्तव्य का पालन करो,
मगर उसके अंदर के इंसान को ज़िंदा रखो।
हैवान मत बनो,
ऐसा मंज़र मत दिखाओ,
ओ, पुलिस वाले भैया!
3 महीने पहले
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