बात जब हक़ की हो तो आवाज़ उठानी ही पड़ती है,
पहुँच न पाए जो आवाज़, तो हुंकृति जगानी पड़ती है।
याद है न वो दिव्य सीख जो कृष्ण ने दी थी गीता में?
न्याय की ख़ातिर अपनों पर भी शमशीर उठानी पड़ती है।
ज़ुल्म को सहना भी है जुर्म, सो इस बाबत कभी-कभी,
भटके हुए ज़ालिमों को भी राह दिखानी पड़ती है।
विनम्रता से माँगने पर भी मिले न अपना अधिकार यहाँ,
तब दमनकारियों कोे अपनी शक्ति दिखानी पड़ती है।