कुछ तो ऐसा हो जो झुठलाना नहीं आसान हो,
कुछ तो ऐसा हो बढ़ाए जो हमारी शान को,
कुछ तो ऐसा हो जो आकर्षित करे जन-वृंद को,
कुछ तो ऐसा हो सजाए जो हमारे हिंद को।
मान-मर्यादा-प्रतिष्ठा धूल रातों-रात में,
बिक रहा है देश अब व्यापारियों के हाथ में।
दौर है नीलामियों का या कि अमृतकाल का,
टूटता ही जा रहा है दर्प भारतपाल का।
देश में शक्कर नहीं तो व्यक्ति जिम्मेदार है,
चाय की कीमत बढ़ाने को मेरी सरकार है।
कब ये चौकीदार है औ कब ये सूबेदार है?
चाय वाला बन गया कब देश का सरदार है?
वोट व नोटों का अंतर तीव्र बढ़ता जा रहा,
हिंद का यह रुपय्या नीचे ठनकता जा रहा।
देश की बर्बाद हालत रंग रहा रंगरेज है,
आ रही फ़िर से ग़ुलामी आ चुके अंग्रेज हैं।
आज के गांधी-भगत हैं बंद कारागार में,
आ चुके हैं फ़िर फिरंगी देश की सरकार में।
यह प्रतीक्षा की घड़ी है वर्ष ही कुछ शेष है,
जल्द ही बदलाव को अब देश का आदेश है।
– श्रेयांश द्विवेदी