मैं पथिक इस प्रज्ञ पथ का, पर स्वयं से हूं अपरिचित।
हो चुकी अर्जित कलाएं, वेद-दर्शन, व्याकरण के,
भाष के वरदान विकसित, हर तरह के, हर चरण के।
ज्ञान विकसित, तान विकसित,
गणित व विज्ञान विकसित,
धरा व आकाश को साधे स्वयं मैं हूं सुशिक्षित।
हो चुकी विकसित है विद्या, पर न विकसित विद्वता है,
पुस्तकीय-विश्वास विकसित, पर न विकसित स्वयंता है।
तत्त्व विकसित, सत्व विकसित,
स्वत्व व अपनत्व विकसित,
पर स्वयं की खोज में डूबा हुआ मैं हूं परीक्षित।
हो चुका है क्षीण मानवता सभी जन के हृदय से,
त्रस्त मानवता विवश है, नवाचारों के उदय से।
देश उन्नत, वेश उन्नत,
शेष यह परिवेश उन्नत,
मैं हुआ अब विज्ञ पर अनभिज्ञ है अब प्रकृति क्षित।
विजेता क्या त्यागता वीरत्व के अस्तित्व को?
मैं सहेजूंगा मनुज के इस बिखरते सत्व को।
इस धरातल पर मनुजता–
का सहज संदेश बोकर,
मैं अतल-पाताल-भूतल पर बिखेरूंगा परिष्कृत।
मैं पथिक इस प्रज्ञ-पथ का पर स्वयं से हूं अपरिचित।
– श्रेयांश द्विवेदी