न नभ में शंख, न रणभेरी,
न ऊँचा कोई सिंहासन।
आज लगी है शनि की अदालत, जहाँ मौन बने है भाषण।
न वकील खड़े, न गवाह यहाँ,न शब्दों का व्यापार।
कर्म स्वयं कटघरे में आए,
खोल रहे हर एक विचार।
धन ने चाहा केस जीतना,
अहंकार उठा अकड़ाकर।
सत्य मुस्काया चुपचाप ही,
खड़ा रहा सिर झुकाकर।
झूठ बहुत कुछ बोल रहा था,
सच बिल्कुल खामोश रहा।
लेकिन शनि की तीखी दृष्टि से, कुछ भी न ओझल हो सका।
एक तराज़ू समय का लाया,
दूजे पलड़े कर्म रखे।
शब्द नहीं, बस नीयत तौली,
चेहरे सारे स्वयं बिखरे।
जिसने भूखे को रोटी दी थी,
नाम कभी न जग से माँगा।
उसकी छोटी-सी नेकी ने,
भाग्य का स्वर्णिम द्वार सजाया।
जिसने आँसू बेच दिए थे,
लाभ-हानि के बाज़ारों में।
उसका वैभव धूल बना फिर,
क्षण भर के त्योहारों में।
शनि बोले-मुझसे डरना व्यर्थ मनुज,यदि अंतर निर्मल होगा।दंड नहीं, परिणाम मिलेगा,जैसा कर्म प्रबल
तेल चढ़ाकर क्या पाओगे,
यदि मन मैला रहने दो?
मेरे मंदिर आने से पहले,
किसी निराश का हाथ थाम लो।
मैं ग्रह नहीं, चेतावनी हूँ,
अन्यायों का अंतिम प्रश्न।
जो उत्तर जीवन से देगा,
उसी का होगा सच्चा यश।
निर्णय सुनते ही मौन बिखर गया,समय स्वयं मुस्काने लगा।
शनि की अदालत से बाहर जो निकला,
पहले से बेहतर इंसान बना।
याद रखो-
शनि की अदालत में
चेहरा नहीं, चरित्र पहचाना जाता है; और वहाँ हर निर्णय
कर्म की स्याही से लिखा जाता है।