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मैं शनि हूँ

Shreya Singh

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            मत डर मुझसे, मैं शनि हूँ,
        
                                                    
                            
कर्मों का बस दर्पण हूँ।
जैसा बोएगा तू जग में,
वैसा ही मैं अर्पण हूँ।

मैंने किस्मत कब लिख डाली?
मैंने राह कहाँ बदली?
तेरे ही हर कर्म की छाया,
तेरे संग-संग चलती।

झूठ अगर तू रोज़ उगाए,
सच की फ़सल कहाँ पाए?
धोखे की जो नींव रखेगा,
महल भला कब टिक पाए?

मैं न क्रोधी, मैं न कठोर,
मैं तो न्याय का हूँ सिरमौर।
झुकता है जो सत्य के आगे,
भर दूँ उसका जीवन भोर।

तेल चढ़ाकर क्या होगा,
मन में यदि अभिमान रहे?
दीप जलाकर क्या होगा,
भीतर यदि तूफ़ान रहे?

मंदिर-मंदिर मत तू भटके,
पहले मन का द्वार खोल।
ईर्ष्या, छल और झूठ जलाकर,
सत्य की धरती पर बोल।

मैं श्रमिक की थकी हथेली,
मैं किसान की प्यास हूँ।
मैं निर्धन की सच्ची मेहनत,
मैं ईश्वर का विश्वास हूँ।

जब तक कर्म पवित्र रहेंगे,
मैं भी तेरा मित्र रहूँ।
अधर्मों की राह चुनेगा,
फिर कैसे तेरे संग चलूँ?

मत डर मुझसे, मैं शनि हूँ,
दंड नहीं-संदेश हूँ।
जिसने खुद को जीत लिया,
उसके जीवन का विशेष हूँ।
2 महीने पहले
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