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कालरात्रि - अंधकार की अंतिम सीमा

Shreya Singh

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            जब-जब जग पर छाया तम का गहरा काला जाल,
        
                                                    
                            
तब-तब लेकर प्रलय का रूप आई माँ कालरात्रि विशाल।

बिखरे केश, गले में बिजली, नयनों में अंगार,
एक हुंकार से काँप उठे, असुरों के दरबार।

श्वास बने जब अग्नि की धारा, गूँजे नभ का छोर,
पापी के हर एक अहंकार का, टूटे उसी क्षण जोर।

गर्दभ पर आरूढ़ भवानी, त्रिशूल लिए कर धार,
वर-मुद्रा से भक्तों को देतीं, निर्भय जीवन सार।

जो भी तेरे चरणों में आया, उसका मिटा संताप,
तेरे नाम का दीप जला तो, दूर हुआ हर पाप।

तू ही काली, तू ही दुर्गा, तू ही जग की शान,
तेरे चरणों में झुकता है, तीनों लोकों का मान।

अंधकार को चीर के निकली, बनकर नई प्रभात,
तेरे आगे हार मान ले, मृत्यु और हर घात।

माँ मन के भीतर जो बैठा, डर का काला राक्षस,
तेरे चरणों में आज समर्पित, कर दे उसका नाश।

क्रोध हमारा धर्म बने, अन्याय से हो युद्ध,
सत्य, करुणा और साहस से, जीवन हो समृद्ध।

जय-जय माँ कालरात्रि भवानी, संकट हरने वाली,
भक्तों के जीवन में भर दो, ज्योति सदा उजियाली।

तेरे चरणों की धूल ही माँ, जीवन का श्रृंगार,
जय नवदुर्गे जय कालरात्रि शत-शत बार नमस्कार।
2 महीने पहले
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