विज्ञापन

अपने ही पास लौट सकूँ।

Shreya Bishnoi

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            थक गई हूँ मैं मन के उच्चावचों से,
        
                                                    
                            
जहाँ हर शिखर के पीछे एक गहरी खाई है।
कभी भीतर कोई नदी अनायास उमड़ती है,
कभी अपनी ही प्यास से आँख भर आती है।
बहुत सँभाला है मैंने स्वयं को,
हर टूटन को मुस्कान का नाम दिया है।
पर अब मन किसी उत्तर का आकांक्षी नहीं,
वह बस थोड़ी-सी निस्तब्धता चाहता है।
जहाँ स्मृतियाँ दस्तक न दें,
जहाँ भविष्य कोई भय न रचे,
जहाँ वर्तमान हथेली पर रखी
ओस की एक बूँद-सा ठहरा रहे,
और मैं, पहली बार,
अपने भीतर से गुज़रकर
अपने ही पास लौट सकूँ।
4 घंटे पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all

Deepti Tripathi

119 कविताएं

View Profile

RATAN KUMAR

787 कविताएं

View Profile