थक गई हूँ मैं मन के उच्चावचों से,
जहाँ हर शिखर के पीछे एक गहरी खाई है।
कभी भीतर कोई नदी अनायास उमड़ती है,
कभी अपनी ही प्यास से आँख भर आती है।
बहुत सँभाला है मैंने स्वयं को,
हर टूटन को मुस्कान का नाम दिया है।
पर अब मन किसी उत्तर का आकांक्षी नहीं,
वह बस थोड़ी-सी निस्तब्धता चाहता है।
जहाँ स्मृतियाँ दस्तक न दें,
जहाँ भविष्य कोई भय न रचे,
जहाँ वर्तमान हथेली पर रखी
ओस की एक बूँद-सा ठहरा रहे,
और मैं, पहली बार,
अपने भीतर से गुज़रकर
अपने ही पास लौट सकूँ।