अतीत की स्मृति में चेहरों का दरपन
रिश्तों के घावों पर वक्त का मरहम
समय की कीमत पर स्वार्थों का मूल्य
और भी बहुत कुछ कहता नीरव मन।
उम्र के पड़ावों पर दायित्वों में जड़े
स्वप्नों के शोर में विभोर चल पड़ा
न जीत की खुशी व हार का भय लिये
अतीत से जो मिला संग वो ले चला।
धैर्य की धरा पर पथ के हर शूल को
स्नेह के सुमन सा हार में पिरो दिया।
सफ़र में किससे कहते मन की व्यथा
बहते अश्कों ने अधरों को रोक दिया।
भावों की करवट पर दिल की धड़कन
कभी वक्त की साख पर तौलता संयम
आईने में ओझिल उन वेदनाओं को
कोई तो बतला दे नियति के भी नियम।
-शिवकांत