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काश हमारी फिल्मों जैसी

Shivcharan Dass

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            अपना किरदार अपना वक्त अपनी कहानी होती
        
                                                    
                            
काश हमारी भी फिल्मों जैसी यह जिंदगानी होती

सुख दुख का गीत गाते गाते कोई कुर्बान हो जाता
भले ही अंगूठा छाप होते पर शायरी जुबानी होती

दुख दर्द का मसला चुटकियों में ही हल हो जाता
एक आवाज पर ही ये सारी दुनियां क़दमों में होती

ना कोई संघर्ष ना कोई मेहनत ना पढ़ाई का झंझट
तीन घंटे में बालक ने जवानी में छलांग लगाई होती

इंसाफ सच धन दौलत रूप रंग ओहदा सब मिलता
इश्के झोपड़ी में रहने को तैयार हरेक हसीना होती

एक दो मुक्के खाके हम सौ सौ को भी निपटा देते
कैसे हीरो मरता भला गोली कितनी ही चलाई होती

अगर मर भी जाते तो कोई गम नहीं रहता दास हमें
निदेशक ने मौत किसी हमशक्ल की दिखाई होती

पर अफ़सोस यह जिन्दगी तो फ़िल्म से जुदा बहुत
हर पल नई मुश्किल कुछ सुलझन तो बनाई होती

झूंठ सच न्याय अन्याय आदर रूप रंग धन दौलत
इश्क की फिल्म में कुछ हकीकत तो दिखाई होती
3 महीने पहले
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