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शीश महल मे रहकर इंसा

Shivcharan Dass

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            ऊँचेमहलों की बुनियादों का हश्र यही बतलाता है
        
                                                    
                            
शीश महल में रहकर इंसा पत्थर दिल हो जाता है

भूखे नंगे बेबस यूँ जिसके पावों में झुके हुए हैं
शहंशाह भी आखिर एक दिन मिट्टी में मिल जाता है

गुलशन सूख गया पर उनको नहीं यहाँ की कुछ परवाह
उनके दरखत पर कागज का नीला गुल खिल जाता है

गर्दन की जुम्बिस पे चलता है दिल का सारा कारोबार
एक इशारे से हर हाकिम भरता पानी मिल जाता है

महज ख्वाब ले जेबों में जो निकले पड़े हैं नंगे पाँव
धूल फांकते बच्चों में गुदड़ी का लाल भी मिल जाता है

जाग रहें जो चाँद सितारे आसमान के आँगन में अब
सूरज का पहरा लगते ही घर का रस्ता मिल जाता है

कश्ती कागज की तैराकर बच्चा है ख़ुश आज बड़ा
घर के आँगन में उसको बहता दरिया मिल जाता है

रोज तिजारत करते हैं अब हँसते चेहरे मीठे बोल
दास अदाकारी का खुलकर दाम यहाँ मिल जाता है
2 घंटे पहले
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