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दम दास का निकलने दे! !

Shivcharan Dass

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            सांस चलती रहे
        
                                                    
                            
इतनी तो हवा चलने दे

सारे मत बुझा यूँ
कुछ तो चराग जलने दे

थका है मुसाफिर
अब तो सूरज ढलने दे

सड़ चुके हैं जो
रस्मो रिवाज़ बदलने दे

प्यार की आंच में
रिश्तों की बर्फ गलने दे

दुनियां पाल रही है
इस आस्तीन में पलने दे

सुबह होते ही महफ़िल?
जरा रात तो उतरने दे

तमाम रात जगा हूँ
आंख अब तो लगने दे

नटखट है बुरा नहीं
बच्चा है अभी सम्भलने दे

दर्द से है पुराना रिश्ता
बाहें खोल गले मिलने दे

बेवफाई के जमाने में
दम दास का निकलने दे! !
2 घंटे पहले
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Prem Chandra

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