सांस चलती रहे
इतनी तो हवा चलने दे
सारे मत बुझा यूँ
कुछ तो चराग जलने दे
थका है मुसाफिर
अब तो सूरज ढलने दे
सड़ चुके हैं जो
रस्मो रिवाज़ बदलने दे
प्यार की आंच में
रिश्तों की बर्फ गलने दे
दुनियां पाल रही है
इस आस्तीन में पलने दे
सुबह होते ही महफ़िल?
जरा रात तो उतरने दे
तमाम रात जगा हूँ
आंख अब तो लगने दे
नटखट है बुरा नहीं
बच्चा है अभी सम्भलने दे
दर्द से है पुराना रिश्ता
बाहें खोल गले मिलने दे
बेवफाई के जमाने में
दम दास का निकलने दे! !