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कभी उलटी कभी सीधी

Shivcharan Dass

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            कभी उलटी कभी सीधी तो तिरछी ये चलती है
        
                                                    
                            
हवा एक सी नहीं रहती हमेशा रुख बदलती है
मुहब्बत की अगर खुशबू उठ जाये फूलों से
सजाकर रंग पंखो में हर तितली निकलती है
नजर तिरछी हुई है उनकी और भी कातिल

वो दिल खाक होगा ये बिजली जिसपे गिरती है
कोई गुमनाम होकर भी हमेशा दिल में रहता है
कोई सूरत किसी की आह पाने को तरसती है
समंदर में उतर के भी बेचारा प्यासा रहता है
कमी कुछ आदमी की जिन्दगी में क़ायम रहती है
कोई है भूख से मरता किसी की भूख मर जाती
ये दुनिया है सितमगर सिर्फ अपनी रौ में चलती है
बनी ये रील है रीयल अब हमारी जान की दुश्मन
भले कट जाये सर लेकिन हर ऊँगली मचलती है
है चारों और ही बारूद की बदबू का भभका दास
कोई निर्दोष एक बस्ती यहां हर रोज जलती है! !
2 घंटे पहले
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