कभी उलटी कभी सीधी तो तिरछी ये चलती है
हवा एक सी नहीं रहती हमेशा रुख बदलती है
मुहब्बत की अगर खुशबू उठ जाये फूलों से
सजाकर रंग पंखो में हर तितली निकलती है
नजर तिरछी हुई है उनकी और भी कातिल
वो दिल खाक होगा ये बिजली जिसपे गिरती है
कोई गुमनाम होकर भी हमेशा दिल में रहता है
कोई सूरत किसी की आह पाने को तरसती है
समंदर में उतर के भी बेचारा प्यासा रहता है
कमी कुछ आदमी की जिन्दगी में क़ायम रहती है
कोई है भूख से मरता किसी की भूख मर जाती
ये दुनिया है सितमगर सिर्फ अपनी रौ में चलती है
बनी ये रील है रीयल अब हमारी जान की दुश्मन
भले कट जाये सर लेकिन हर ऊँगली मचलती है
है चारों और ही बारूद की बदबू का भभका दास
कोई निर्दोष एक बस्ती यहां हर रोज जलती है! !
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