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ये दुनियां आख़री शायद कोई मंजिल नहीं है

Shivcharan Dass

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            सफर है रात दिन और कुछ हासिल नहीं है
        
                                                    
                            
ये दुनियां आख़री शायद कोई मंजिल नहीं है
लगती है खूबसूरत कितनी फूलों सी नाजुक
लेकिन ख़ुशी हरदम यहां कामिल नहीं है
तीर उसका हर जिगर के पार होता है मगर
लगता है उसको तो कोई घायल नहीं है
हर किसी का ना कुछ होता है मेयार
आज का इंसान मगर कायल नहीं है
कुछ ना कुछ तो आज होके ही रहेगा
संगदिल का दास कोई पर हल नहीं है!
14 मिनट पहले
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