सफर है रात दिन और कुछ हासिल नहीं है
ये दुनियां आख़री शायद कोई मंजिल नहीं है
लगती है खूबसूरत कितनी फूलों सी नाजुक
लेकिन ख़ुशी हरदम यहां कामिल नहीं है
तीर उसका हर जिगर के पार होता है मगर
लगता है उसको तो कोई घायल नहीं है
हर किसी का ना कुछ होता है मेयार
आज का इंसान मगर कायल नहीं है
कुछ ना कुछ तो आज होके ही रहेगा
संगदिल का दास कोई पर हल नहीं है!