बिना किनारे और पानी के बहता ये मन का दरिया
हरदम तूफानों का जरिया बनता ये मन का दरिया
आंख नहीं लेकिन देखें सब सुनता है बहरा होकर
सरपट चलता पाँव नहीं पर ऐसा ये मन का पहिया
पल में तोला पल में माशा नित करता ये नया तमाशा
सब कुछ अपनाना चाहे पर डरता ये मन का जरिया
कौन कहे सब जग अपना है कौन कहे कुछ अपना नहीं
बार बार खाकर धोखा भी खुद छलता ये मन का दरिया
अपनी अपनी करनी पर है ये नेकी कर दरिया में डाल
बात यही कहता है आखिर में ढलता ये मन का दरिया
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