आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

बात यही कहता है आखिर में ढलता ये मन का दरिया

                
                                                         
                            बिना किनारे और पानी के बहता ये मन का दरिया
                                                                 
                            
हरदम तूफानों का जरिया बनता ये मन का दरिया

आंख नहीं लेकिन देखें सब सुनता है बहरा होकर
सरपट चलता पाँव नहीं पर ऐसा ये मन का पहिया

पल में तोला पल में माशा नित करता ये नया तमाशा
सब कुछ अपनाना चाहे पर डरता ये मन का जरिया

कौन कहे सब जग अपना है कौन कहे कुछ अपना नहीं
बार बार खाकर धोखा भी खुद छलता ये मन का दरिया

अपनी अपनी करनी पर है ये नेकी कर दरिया में डाल
बात यही कहता है आखिर में ढलता ये मन का दरिया
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
44 मिनट पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर