मैं ज्ञान का भंडार लिए बैठा हूँ
मैं दुश्वारियाँ हज़ार लिए बैठा हूँ
किस तरफ किनारा है कुछ समझ नही आता
मैं तूफान का मझधार लिये बैठा हूँ
पर हासिल होगा मेरी किश्ती को किनारा एक दिन
गिर के फिर खड़ा हो जाऊंगा दुबारा एक दिन
डगमगाते कदमो से ही सही पर चलता जाऊंगा
हमको भी मिलेगा मंज़िल का नज़ारा एक दिन
वक़्त तो लगेगा वर्षो से सोइ किस्मत को जगाने मे
पर मजा आएगा गुथी ज़िन्दगी की सुलझाने में
अभी गम के बादल है थोड़ा संभल के चलना
एक आग जलानी पड़ेगी भीतर ,एक सूरज उगाने में
अभी तन्हा हूं अकेला हु नाशाद हूं
पर हारा नही हूं अब भी नाबाद हूं
तुम साथ होते तो बात कुछ और होती
तेरे बिना तो मैं बिल्कुल बेअस्बाब हूं|
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