ख्वाबों का स्वेटर बुनती रहती हूँ,
धागों में अपनी उम्मीदें पिरोती रखती हूँ।
देखो, पर सर्दियाँ आने तक हर बार
वो कहीं न कहीं अधूरा रह जाता है।
कभी कोई फंदा (धागा) छूट जाता है,
कभी कोई रंग कम पड़ जाता है,
और कभी दिल ही थक कर
बुनना थोड़ा धीमा कर जाता है।
फिर भी हर मौसम से पहले
मैं नए धागे जोड़ लेती हूँ,
क्योंकि अधूरे ख्वाबों को भी
मैं प्यार से ओढ़ लेना सीख लेती हूँ।