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कहीं और चलते है

Shivanee Yadav

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            चल ,कहीं और चलते हैं,
        
                                                    
                            
एक अनजान सी कश्ती में
किसी वीरान सी बस्ती में
जहाँ श्वार्थ नही केवल

प्रेम भाव ही रहते हैं
चल, कहीं और चलते हैं।
छोड़ इस संसार को
जीत के आसार को,
प्रीत के जलधार में
चित्त के उद्धार में,
जहाँ मिले सच्चा अनुराग ,

चरण रज उसकी धरते हैं
चल, कहीं और चलते हैं।
मोल करे अनमोल राग का,
प्राण रहे न रहे किसी का,
छोड़ इस निष्प्राण जगत को
किसी और लोक में बसते हैं,
चल कहीं और चलते हैं
चल कहीं और चलते हैं ।

-सीमा यादव

- हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

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6 वर्ष पहले
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