चल ,कहीं और चलते हैं,
एक अनजान सी कश्ती में
किसी वीरान सी बस्ती में
जहाँ श्वार्थ नही केवल
प्रेम भाव ही रहते हैं
चल, कहीं और चलते हैं।
छोड़ इस संसार को
जीत के आसार को,
प्रीत के जलधार में
चित्त के उद्धार में,
जहाँ मिले सच्चा अनुराग ,
चरण रज उसकी धरते हैं
चल, कहीं और चलते हैं।
मोल करे अनमोल राग का,
प्राण रहे न रहे किसी का,
छोड़ इस निष्प्राण जगत को
किसी और लोक में बसते हैं,
चल कहीं और चलते हैं
चल कहीं और चलते हैं ।
-सीमा यादव
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