बहुत दिन बीते हम साथ ना बैठे,
आज साथ आ ही गए आते आते
सत्ता से मैं, विपक्ष भाई और बहस संचालक
महफ़िल शुरू हुई शाम ढलते ढलते
मैं बोला कितनी अजीब बात है
बहसों में मैं बुलाया जाता
विपक्षियों को सुनने का ढोंग
और सुना सिर्फ़ मुझे जाता
मुद्दों का तो कहना ही क्या
अजी नफ़रत का सामान है
जनता तो गई ही है तेल लेने
मुझे मेरे आक़ा की आन है
मैंने विपक्षी भाई से पूछा
क्यों आते हो इन बहसों में
वह बोला ज़िल्लत ही सही कुछ तो मिलेगा
वोट तो मिला ही नहीं बरसों में
वह फिर मुझको बोला
तुम्हें तो सर आँखों में बैठाया गया है
हर बार बहस में तुम्हें जिताया गया है
असली मुद्दों को दफ़न करके
मज़हब जात पात में उलझाया गया है
मैं बोला तुम्हें पता है हर बार हारना तुम्हें है
मुझे पता है, हर बार जीतना मुझे है
जश्न मनाएं कि सोते हैं सब इस शहर में
ये ऐसे ही रहें, फ़ायदा तो हमें ही है
विपक्षी भाई ने बहस संचालक से पूछा
क्यों नहीं मर जाते तुम शर्म से
वह बोला मजबूरी है मेरी क़सम से
मुझे मेरे आक़ा को, आक़ा को उसके आक़ा को
रोज़ जवाब है देना पड़ता
अब तो आत्मा भी बिक गई है
जिसे ख़ुद ही पसंद नहीं करते
उसी के क़सीदे रोज़ है पढ़ना पड़ता
आओ हमप्याला हमजाम हो जायें
आक़ा हो गया नीरो हम सब रोम हो जायें
-शिवम् खरे