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कल अपनी ही बारी है

Shelendra Shukla

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            हजारों लोगों के बीच खड़े,
        
                                                    
                            
ताने छाती जो भारी है,
चुप्पी साधे, छुपकर चलना,
अब लगती समझदारी है।
झूठ बात को आगे रखना,
उन्नति की अब युक्ति है,
सच्चाई से जीवन जीना,
पैदा करती दुश्वारी है।

सीधे सच्चे इंसानों को,
मूर्ख यहाँ समझा जाता,
जो जितना मक्कार यहाँ है,
वो उतना आदर पाता।
मूल्यों की इस अंधी दौड़ में,
नैतिकता भी हारी है,
सच्चाई से जीवन जीना,
पैदा करती दुश्वारी है।

चेहरे पर तो सौम्यता है,
भीतर छल की तैयारी है,
सच कहने की हिम्मत खोकर,
चाटुकारिता जारी है।
धर्म-करम की बातें करते,
पर नीयत में गद्दारी है,
सच्चाई से जीवन जीना,
पैदा करती दुश्वारी है।

पर याद रहे यह झूठ कभी भी,
सच को हरा नहीं सकता,
बर्तन चाहे चमके कितना भी ,
चेहरा दिखा नहीं सकता ।
आज भले ही कठिन डगर है,
कल अपनी ही बारी है,
सच्चाई से जीवन जीना,
पैदा करती दुश्वारी है।
- शैलेंद्र शुक्ला "हलदौना"
2 महीने पहले
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