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निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल।

Shatyagashi -The

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल।
        
                                                    
                            
आज-कल के नवपल्लव सब, शायद गये हैं भूल।

भाषा दूसरो की ग्रहण कर, सभ्य पुरूष कहलाते हैं।
ठुकराकर बूढ़ी माता को, जाने क्यों न शरमाते हैं?

सोचते हैं हिंदी में पर, बोलने में शरमाते हैं।
पता नहीं निज भाषा को, तिरस्कृत कर क्या पाते हैं?

हिंदी गर भाषा हो जाती, समस्त राष्ट्र हिंदुस्तान की।
अपनी ही माँ गूँगी न रहती, बोली बोलती शान की।

विश्व के चहु दिशाओं में होता, हिंदी-हिंदू-हिंदुस्तान।
लहराता सम्पूर्ण जगत में, दया धर्म मानवता का गान।

पर निज घर में ही चाकर बनकर, दमित पड़ी हैं हिंदी।
न जाने कब? मातृ भाल पर, चमका करेगी हिंदी बिंदी।

हिंदी की बिंदी से, हे मानस!, माता का श्रृंगार करें।
हिंदी ही है हृदय हरण, हुलसित हृदय से स्वीकार करें।
- पवन कुमार साव "शत्यागाशी"
एक महीने पहले
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