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"मौन से मोक्ष तक"

Shatakshi Sarswat

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            असंख्य विचारों के मध्य,
        
                                                    
                            
आधी रात वह एकांत में बैठा था।
भाव शब्दों का रूप लेकर पन्नों पर उतरना चाहते थे,
पर मौन की गहराई उन्हें रोक लेती थी।

न मन व्याकुल था,
न किसी चिंता का भार था।
न जाने कहाँ से ऐसी स्थिरता उतर आई,
कि जीवन का संपूर्ण सार
एक ही क्षण में प्रकट हो उठा।

उसी मौन में उसे यह बोध हुआ—
जीवन शब्दों की सीमाओं से कहीं परे है।
सत्य-असत्य के द्वंद्व, अहंकार,
भौतिक मोह और समस्त मानवीय बंधनों से परे,
केवल ब्रह्म ही परम सत्य है।

मनुष्य उस चेतना तक पहुँच नहीं पाया,
जहाँ बिना कहे भी सब कुछ समझ लिया जाए।
न ही वह उस परम चेतना को पूर्णतः अनुभव कर पाया,
जो प्रत्येक श्वास में निहित होकर
उसे जीवन-पथ दिखाती रहती है।

उसी बोध में यह भी स्पष्ट हुआ—
आत्मा केवल इस देह की पहचान नहीं,
वह एक अनंत चेतना का अंश है।
मानव-देह धारण कर वह पृथ्वी पर आती है,
अपने कर्तव्यों का निर्वहन करती है,
और समय पूर्ण होने पर
इस नश्वर शरीर का त्याग कर
अपनी अनंत यात्रा पर अग्रसर हो जाती है।

पीछे रह जाते हैं उसके कर्म,
उसके विचार और उसके संस्कार,
जो समय की सीमाओं से परे
इस जगत में अपनी छाप छोड़ जाते हैं।

अंततः मौन ही उसका उत्तर बन गया।
मानवता, प्रेम, करुणा
और सत्कर्म उसी दिव्य बोध की अभिव्यक्ति हैं।
जिस आत्मा का मन निर्मल हो जाता है,
वह ब्रह्म को अनुभव कर
मोक्ष के मार्ग पर आगे बढ़ जाती है।
2 महीने पहले
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