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मगर भेजा कभी नहीं।

Shashwat Sarang

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            अभी तो उम्र ने
        
                                                    
                            
ठीक से धूप भी न देखा था,
कि तूने शामों के कई मौसम
आँखों में रख दिए।

कुछ किताबें बदलीं,
कुछ पन्ने पलटे,
और देखते ही देखते
वो लड़का, जो हर खाली जगह में
कुछ लिख दिया करता था,
अब खाली जगहें ढूँढता फिरता है।

कभी शब्दों से दोस्ती थी,
कभी ख़ामोशी भी अपना लगता था,
कभी किसी बात पर घंटों हँसना
और किसी बात पर पूरी रात लिखना—
सब कितना सहज था।

फिर रास्तों ने
अपने-अपने मोड़ चुन लिए।

कभी लगता था
बस एक मुकाम मिल जाए,
तो बाकी सब अपने-आप
छोटा पड़ जाएगा।
मगर मुकाम के पास पहुँचकर जाना—
कुछ दूरियाँ
पैरों से नहीं,
वक्त से तय होती हैं।

अब किताबें ज़्यादा हैं,
मगर पन्नों के बीच
अपने लिए जगह कम।
सवाल बहुत हैं,
जवाबों के लिए रातें कम।

जो कभी हर बात पर
कुछ कुछ कह देता था,
आज वही कई-कई दिनों तक
अपने भीतर मौन लिए घूमता है।

आईना अब भी वही है,
बस उसमें खड़ा शख़्स
पहले जैसा बेफ़िक्र नहीं।

कभी अपने ही शब्दों से
दुनिया को चुप करा देने का
एक गुरूर सा था;
अब अपनी ही ख़ामोशी से
बहुत कुछ सीख रहा हूँ।

अजीब है न—
उम्र बढ़ती गई,
और समझ आया
कि कुछ हासिल करना
दरअसल कुछ चीज़ों को
पीछे छोड़ आने का दूसरा नाम है।

फिर भी,
जो छूट गया,
वो व्यर्थ नहीं गया।

वो कहीं भीतर
आज भी साँस लेता है—
किसी पुराने गीत की तरह,
किसी भूली हुई शाम की तरह,
किसी ऐसे ख़त की तरह
जिसे लिखा तो गया था,
मगर भेजा कभी नहीं।

ऐ ज़िंदगी,
तुझसे अभी तो
बहुत हिसाब बाकी है।

बस एक शिकायत है—
इतनी छोटी-सी उम्र में
तूने इतना कुछ दिखा दिया
कि अब उम्र का बढ़ना
सिर्फ़ आगे बढ़ना नहीं लगता।

कभी-कभी लगता है,
मैं बड़ा नहीं हुआ—
बस मेरे भीतर
बहुत-सी उम्रें
एक साथ रहने लगी हैं।
शाश्वत सिन्हा
7 घंटे पहले
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