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सावन का विरह

शेषमणि शर्मा

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            हरियाली उमड़ी अथच, घन अशेष घहराय।
        
                                                    
                            
प्रियतम तुम्हरे जियत ही, सावन सूना जाय।।१
सावन सा वन पिउ बिना, घर ज्यों कारागार।
शेष छौंकनी सी लगे, सावन की बौछार।।२
खेती करने आ गये, सबके अपने कन्त।
सावन क्या उमड़ा नहीं, जहाँ शेष श्रीमन्त।।३
सावन में पत्नी सहित, हरि करते विश्राम।
यह भी पिय समझें नहीं, बने शेष निष्काम।।४
चोर घूमते रात में, है अशेष बरसात।
असुरक्षा में धन पड़ा, पिय कब समझे बात।।५
कानाफूसी कर रहे, शेष पड़ोसी लोग।
सावन में भी सह रही, कैसे दुसह वियोग।।६
बड़े बूढ़ सवना रहे, चढ़ी अशेष उमंग।
मैं विरहन सूखी पड़ी, शिथिल भये सब अंग।।७
मोर मोरनी नाचकर, लूटें प्रेम प्रसाद।
शेष भाग्य की मैं जली, तुम पर चढ़ा प्रमाद।।८
गधे हरियरी देख के, रेंक रहे असरार।
तुमको जाने क्या हुआ, सुने न शेष पुकार।।९
झूलें झूला गोतिनी, सबके खेवनहार।
मैं तो अपने कन्त से, हुई शेष लाचार।।
बिन शोधे करवा दिया, बिना लग्न का ब्याह।
मरे शेष पण्डित वही, यह विरहन की डाह।।१०
बाहर से सब बोलते, रखते मन में घात।
बिन साजन किससे करूँ, अपने मन की बात।।११
शेष कुँवारी थी भली, प्रेम व्याधि से दूर।
विरह वेदना दे रहा, दो चुटकी सिन्दूर।।१२
2 महीने पहले
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